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ढोल-नगाड़ों की गूंज, शंखनाद, जयकारों की गूँज

परंपरा, आस्था और उत्साह का संगम... विगत 50 वर्षों से निरंतर कजलिया पर्व के उपलक्ष में जय दुर्गे अखाड़ा मंडल की ओर से भव्य जुलूस का आयोजन किया जाता आ रहा है।

✍🏻✍🏻🎤एडिटर इन चीफ – अभिषेक नामदेव 👈✍🏻✍🏻✍🏻

ढोल-नगाड़ों की गूंज, शंखनाद, जयकारों की गूँज परंपरा,                 आस्था और उत्साह का संगम…

विगत 50 वर्षों से निरंतर कजलिया पर्व के उपलक्ष में जय दुर्गे अखाड़ा मंडल की ओर से भव्य जुलूस का आयोजन किया जाता आ रहा है।

यह सिर्फ एक आयोजन नहीं… बल्कि ग्रामवासियों के हृदय में बसे विश्वास और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।”

: सजे-धजे अखाड़ा मंडल, भगवा पताकाएं, पारंपरिक वेशभूषा में युवा]

“जुलूस की शुरुआत ढोल-नगाड़ों की गूंज, शंखनाद और जय माता दी के जयकारों के साथ होती है…

सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल होकर इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।

हर गली, हर चौक पर ग्रामीण उत्साह से स्वागत करते हैं… और यह उत्साह, हर किसी के चेहरे पर साफ झलकता है।

“ग्रामवासी बताते हैं कि यह आयोजन उनके लिए सिर्फ धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि आपसी एकता और भाईचारे का प्रतीक भी है।

पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ रही है…

और हर वर्ष कजलिया का यह पर्व पूरे गांव को उत्साह और उमंग से भर देता है।”

माता की झांकी, पारंपरिक नृत्य, फूलों की वर्षा]

“जय दुर्गे अखाड़ा मंडल का यह भव्य जुलूस न केवल आस्था का उत्सव है…

बल्कि यह संदेश भी देता है कि जब तक हमारी परंपराएं जीवित हैं, तब तक हमारी संस्कृति अमर रहेगी।”

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